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राजनीतिसंयुक्त राज्य अमेरिका

ट्रंप की संभावित वापसी पर सहयोगी देशों में इतनी बेचैनी

२६ अप्रैल २०२४

अमेरिका के सहयोगी ट्रंप की संभावित वापसी की हालत में अपने हितों की रक्षा या फिर उन्हें आगे बढ़ाने के लिए अभी से जुट गए हैं. व्हाइट हाउस में ट्रंप की वापसी के कयास या फिर संभावना भर से ही तैयारियों ने जोर पकड़ लिया है.

न्यू यॉर्क में प्रेस कांफ्रेंस के लिए पहुंचे डॉनल्ड ट्रंप
डॉनल्ड ट्रंप की विदेश नीति से कई देशों को परेशानी उठानी पड़ी थीतस्वीर: Yuki Iwamura/AP Photo/picture alliance

जर्मनी अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी के भीतर अपनी पैठ बना रहा है, जापान ने ट्रंप के करीबियों तक पहुंच बनाने के लिए अपनी टीम तैयार की है, मेक्सिको के अधिकारी ट्रंप के लोगों से बात कर रहे है और ऑस्ट्रेलिया ऐसे कानून बनाने में व्यस्त है, जो अमेरिका के साथ रक्षा संबंधों को ट्रंप से बचा सकें.

अमेरिका के चुनावों में ढुलमुल रवैया रखने वाले राज्यों में हुए हाल के एक सर्वे ने ट्रंप की वापसी की संभावना जताई है. हालांकि सहयोगी देशों के कान तो पहले से ही खड़े हैं. वो ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" नीतियों की चोट से खुद को बचाना चाहते हैं, जिसका खामियाजा ट्रंप के कार्यकाल में उन्हें उठाना पड़ा था. इनमें कारोबारी जंग से लेकर, सुरक्षा संबंधों में उठापटक, आप्रवासियों पर कार्रवाई और वैश्विक जलवायु समझौते से अमेरिका के बाहर निकल जाने जैसे कदम शामिल हैं.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने ट्रंप के संभावित दूसरे कार्यकाल की तैयारियों पर पांच महादेशों में अधिकारियों से बात की है. इनसे ट्रंप को समझने वाले नए विदेश मंत्री पर विचार, रक्षा समझौते को तेजी से निपटाने में राजदूत की भूमिका और विदेशी अधिकारी के रिपब्लिकन राज्यों के गवर्नरों से बातचीत की जानकारी मिली है.

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ट्रंप से सीधे मुलाकात और बातचीत

कुछ देशों के नेता तो एक कदम और आगे चले गए हैं. उन्होंने जो बाइडेन की नाराजगी का खतरा उठा कर भी सीधे ट्रंप से बातचीत की है. इस बातचीत की जानकारी रखने वाले सूत्रों ने रॉयटर्स को बताया है कि इनमें हंगरी के प्रधानमंत्री और पोलैंड के राष्ट्रपति हाल के हफ्तों में ट्रंप से मिल चुके हैं. ब्रिटेन के विदेश मंत्री डेविड कैमरन ने भी इसी महीने डॉनल्ड ट्रंप के फ्लोरिडा वाले रिसॉर्ट में उनसे मुलाकात की है. 

व्हाइट हाउस की प्रवक्ता कैरिन ज्याँ पिएर का कहना है कि कैमरन ने जैसी मुलाकात की थी वो कोई असामान्य बात नहीं है. न्यू यॉर्क टाइम्स ने विक्टर ओरबान या सऊदी अरब के नेता से फोन पर हुई बातचीत की खबर दी थी. जॉं पिएर ने इसके बारे में पूछे सवाल का जवाब नहीं दिया.

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सऊदी सरकार के मीडिया कार्यालय और ट्रंप की प्रचार टीम ने भी इस पर जवाब नहीं दिया. प्रचार टीम का कहना है कि ट्रंप ने सभी यूरोपीय नेताओं से सुरक्षा के मामलों पर चर्चा की है. इनमें पोलिश राष्ट्रपति आंद्रेयेज डूडा का एक प्रस्ताव भी है जिसमें उन्होंने नाटो के सदस्यों को जीडीपी का कम से कम 3 फीसदी सुरक्षा पर खर्च करने की बात कही है. 

जो बाइडेन और डॉनल्ड ट्रंप की विदेश नीति में बहुत फर्क हैतस्वीर: imago images

टेक्सस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और प्रेसिडेंशियल हिस्टोरियन जेरेमी सूरी का कहना है कि उम्मीदवारों और राजनयिकों के बीच मुलाकात सामान्य बात है. हालांकि ओरबान से मुलाकात और सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से बातचीत को इसमें शामिल नहीं किया जा सकता.

ट्रंप के सलाहकार ब्रायन ह्यूज्स का कहना है, "दुनिया के नेताओं के फोन कॉल और उनसे मुलाकातें उस चीज की प्रतिछाया है जिसे घरेलू स्तर पर पहले ही लोग जान चुके हैं. जो बाइडेन कमजोर हैं और जब 47वें राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप शपथ लेंगे तो दुनिया ज्यादा सुरक्षित होगी और अमेरिका ज्यादा समृद्ध."

जर्मनी की बाइपास डिप्लोमेसी 

जर्मनी ट्रंप के रिपब्लिकन आधार के साथ राज्य के स्तर पर पुल बना रहा है. वह पार्टी के अधिकारियों को याद दिला रहा है कि उसने अमेरिका के उद्योग जगत में भारी निवेश किया है. ट्रंप ने राष्ट्रपति रहते हुए जर्मन कार उद्योग पर शुल्क लगाया था और सत्ता में वापसी होने की स्थिति में सारे आयात पर कम से कम 10 फीसदी शुल्क लगाने की बात कही थी.

ट्रंप के संभावित दूसरे कार्यकाल के लिए खुद को तैयार करने में जर्मनी एक संयोजक का इस्तेमाल कर रहा है. संयोजक के रूप में मिषाएल लिंक जर्मनी की उस कवायद में जुटे हैं जिसे "बाइपास डिप्लोमेसी" नाम दिया गया है. इसमें केंद्र सरकार से बच कर निकल के सीधे उन राज्यों की सरकारों से बात की जा रही है, जहां जर्मनी का भारी निवेश है.

लिंक ने रॉयटर्स से कहा, "अगर ट्रंप दोबारा चुने जाते हैं तो यूरोपीय संघ की चीजों को भारी शुल्क की योजना से बचाना बेहद अहम होगा." लिंक ने बताया कि उन्होंने ओकलाहोमा, अरकन्सॉ, अलबामा और इंडियाना के गवर्नरों से मुलाकात की है. हर मुलाकात में उन्होंने यह समझाने की कोशिश की है कि अच्छा कारोबारी संबंध, जर्मनी की अमेरिका में मौजूदगी का आधार क्यों है. अमेरिका में बनी कारों का सबसे बड़ा निर्यातक बीएमडब्ल्यू है. जर्मनी का कहना है कि इस कंपनी के लिए 860,000 अमेरिकी सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से काम करते हैं.

लिंक का कहना है कि वह डेमोक्रैटिक पार्टी के अधिकारियों से भी मिल रहे हैं लेकिन फिलहाल ट्रंप को प्रभावित करने वाले लोगों से मिलना उनकी प्राथमिकता है. ट्रंप को इसकी जानकारी है या नहीं इस बारे में खबर नहीं मिल सकी है.

ट्रंप के दोस्त

मेक्सिको सरकार के अधिकारी ऐसे लोगों से मिल रहे हैं जो आप्रवासन, फेनेटेनिल की तस्करी जैसे मुद्दों पर ट्रंप के करीब हैं. इन मामलों में ट्रंप प्रशासन के संभावित दूसरे कार्यकाल में मेक्सिको पर ज्यादा अमेरिकी दबाव हो सकता है. मेक्सिको में दो सूत्रों ने इस बारे में जानकारी दी है. ट्रंप ने कहा था कि वह अमेरिकी रक्षा विभाग, पेंटागन को कार्टेल के नेतृत्व पर हमला करने के लिए "स्पेशल फोर्सेज का उचित इस्तेमाल" करने के आदेश देंगे. जाहिर है कि इससे मेक्सिको की सरकार तो खुश नहीं होगी. 

मेक्सिको के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने उत्तर अमेरिकी मुक्त व्यापार समझौते पर भी चर्चा की है. यह समझौता 2020 में ट्रंप के कार्यकाल में हुआ था. अब 2026 में इसकी शर्तें दोबारा तय होंगी. तब हो सकता है कि एक बार फिर ट्रंप ही सामने हों. ट्रंप इस डील की नई शर्तों को अपनी तारीफ में कई बार इस्तेमाल कर चुके हैं. 

ट्रंप के कार्यकाल में निजी रिश्ते कितना महत्व रखते हैं इसका संकेत इस बात से भी मिल जाता है कि मेक्सिको की सत्ताधारी पार्टी ने एक वैकल्पिक उम्मीदवार ढूंढ लिया है जिसे ट्रंप के जितने की स्थिति में अगला विदेश मंत्री बनाया जा सके. इस बारे में चल रही बातचीत की जानकारी रॉयटर्स को दो सूत्रों से मिली.

जापान के ट्रंप करीबी

ट्रंप कैंप से कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने के लिए जापान सुनाओ ताकाओ को तैनात करने की तैयारी में है. हॉर्वर्ड में पढ़े इंटरप्रेटर ताकाओ ने प्रधानमंत्री शिंजो आबे को गोल्फ के खेल के दौरान ट्रंप से संबंध बढ़ाने में मदद दी थी.

ट्रंप की प्रचार टीम के मुताबिक जापान के एक और पूर्व प्रधानमंत्री तारो असो ने इसी हफ्ते ट्रंप से न्यू यॉर्क में मुलाकात की है. सरकारी अधिकारियों के मुताबिक एशिया में अमेरिका के सबसे बड़े सहयोगी को चिंता है कि कहीं वापसी पर ट्रंप दोबारा से कारोबारी संरक्षणवाद ना शुरू कर दें और जापान में अमेरिकी फौज को रखने के लिए ज्यादा पैसों की मांग ना रख दें. 

ट्रंप की संभावना से बेचैनी

अमेरिका में ऑस्ट्रेलिया के राजदूत केविन रड पर्दे के पीछे से एक प्रमुख रक्षा समझौते को ट्रंप से बचाने की कोशिश कर रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया के एक राजनयिक सूत्र ने यह जानकारी दी है. बाइडेन प्रशासन ऑस्ट्रेलिया को परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों का बेड़ा तैयार करने में मदद के लिए रजामंद हुआ है. इसके लिए अमेरिका ऑस्ट्रेलिया को वर्जीनिया क्लास की 3-5 हमलावर पनडुब्बियां बेचेगा. 

रड ने सरकार पर दबाव बनाया है कि वह जल्दी से विधेयक ला कर देश को अमेरिका के हथियार नियंत्रण मानकों के करीब ले आए और एक विशेष परमाणु सुरक्षा एजेंसी बनाए. यह सब कवायद जल्दी से इसलिए है ताकि अगर ट्रंप की वापसी हो तो, उनके लिए इस समझौते से बाहर निकलना कठिन बनाया जा सके.  

डॉनल्ड ट्रंप ने किया सरेंडर, अमेरिकी राष्ट्रपति पहली बार पहुंचा जेल

स्ट्रैटजिक एनालिसिस ऑस्ट्रेलिया से जुड़े रक्षा विशेषज्ञ माइकल शूब्रिज का कहना है कि ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" नीति इस समझौते को अब भी डुबो सकती है. 

यूरोप अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित

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शूब्रिज ने कहा, "सारे लीवर तो वहीं मौजूद है ट्रंप को बस कहना है, 'अमेरिकी नौसेना के पास पर्याप्त नहीं हैं, तो ऑस्ट्रेलिया को एक भी नहीं मिलेगा.'" हालांकि ट्रंप ने प्रचार के दौरान इस समझौते का अब तक जिक्र नहीं किया है.  

दक्षिण कोरिया की चतुर कोशिशें

अमेरिकी सहयोगी अगर चतुराई दिखाना चाहें तो ट्रंप को प्रभावित करने का एक तरीका लॉबिइस्ट हैं. अमेरिका में रह रहे दक्षिण कोरिया के एक पूर्व अधिकारी ने बताया कि बाइडेन प्रशासन की विदेशी सरकारों पर नजर है. ऐसे में दक्षिण कोरिया ट्रंप को समझने के लिए लॉबिइस्टों का सहारा लेगा जिसमें वह छिपा रह सकेगा. 

वॉशिंगटन के लॉबिइस्टों के इलाके में दक्षिण कोरियाई अधिकारी बहुत चक्कर काट रहे हैं. एक अधिकारी ने बताया कि उनका मकसद कारोबार और निवेश के मामले में ट्रंप के विचारों को समझना है. वो यह भी समझना चाहते हैं कि बाइडेन के इंन्फ्लेशन रिडक्शन एक्ट यानी आईआरए का क्या होगा. कई देश ट्रंप के करीबी लॉबिइस्टों का इस्तेमाल कर रहे हैं.

जिसकी जैसी जरूरत उसकी वैसी कोशिश, हर सहयोगी ने अपनी आशंकाओं और चिंताओं से निपटने के लिए अलग अलग रास्ते निकाले हैं. ये तो हुई सहयोगियों की बात जरा उनकी चिंता के बारे में भी सोचिए जो सहयोगी नहीं हैं. 

एनआर/वीके (रॉयटर्स)

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