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स्वास्थ्यसंयुक्त राज्य अमेरिका

रसोई गैस पर खाना पकाने से बच्चों में अस्थमा का जोखिम

१२ जनवरी २०२३

लकड़ी और कोयला के मुकाबले रसोई गैस पर खाना पकाना कहीं बेहतर है. लेकिन रसोई गैस पूरी तरह क्लीन नहीं है. रिसर्च बताते हैं कि इसके कारण घर की हवा खराब हो सकती है. लेकिन क्या इससे बच्चों को अस्थमा होने का जोखिम भी है?

शोध में पाया गया कि छोटे बच्चों को होने वाले अस्थमा के करीब 12 फीसदी मामलों का संबंध रसोई में इस्तेमाल होने वाली प्राकृतिक गैस से हो सकता है.
शोध में पाया गया कि छोटे बच्चों को होने वाले अस्थमा के करीब 12 फीसदी मामलों का संबंध रसोई में इस्तेमाल होने वाली प्राकृतिक गैस से हो सकता है.तस्वीर: Matej Kastelic/Zoonar/picture alliance

रसोई गैस पर खाना पकाने से बच्चों को अस्थमा होने का खतरा हो सकता है. यह बात एक नए अध्ययन में सामने आई है. शोध में पाया गया कि छोटे बच्चों को होने वाले अस्थमा के करीब 12 फीसदी मामलों का संबंध रसोई में इस्तेमाल होने वाली प्राकृतिक गैस से हो सकता है. इस रिपोर्ट ने रसोई चूल्हों से जुड़ी स्वास्थ्य आशंकाओं पर बहस तेज कर दी है.

अमेरिका में हुई इस स्टडी के नतीजे दिसंबर 2022 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एनवॉयरमेंटल रिसर्च एंड पब्लिक हेल्थ में छपे थे. इसे विशेषज्ञों की समीक्षा के बाद प्रकाशित किया गया था. इस स्टडी में शामिल लेखकों के मुताबिक, उन्हें मिले नतीजों से संकेत मिलता है कि अमेरिका में करीब साढ़े छह लाख बच्चों को अस्थमा नहीं हुआ होता, अगर उनके घर में इलेक्ट्रिक या इंडक्शन स्टोव होता. शोधकर्ताओं ने गैस के इस्तेमाल से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर की तुलना सेकेंड-हैंड स्मोकिंग से की है.

कई पुरानी स्टडी का डेटा इस्तेमाल किया गया

इस अध्ययन में गैस स्टोव के कारण घरों में अस्थमा होने के जोखिम का आकलन किया गया है. इस आशंका की पड़ताल के लिए शोधकर्ताओं ने 2013 में हुए एक रिव्यू से भी आंकड़े लिए हैं. इस रिव्यू में पहले हो चुके 41 अध्ययनों की समीक्षा की गई थी. शोधकर्ताओं ने इस रिव्यू की गणनाओं को अमेरिका की जनगणना के आंकड़ों के साथ मिलाया. संबंधित रिव्यू के आंकड़े इससे पहले 2018 में हुई एक रिसर्च में भी इस्तेमाल किए जा चुके हैं. उसके नतीजे ऑस्ट्रेलिया से जुड़े थे. उस रिसर्च के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया में बचपन में होने वाले अस्थमा के करीब 12.3 प्रतिशत मामलों का संबंध गैस स्टोव से हो सकता है.

9 जनवरी को छपी एक रिपोर्ट में इसी कैलकुलेशन के आधार पर यूरोपीय संघ में भी लगभग 12 फीसदी बच्चों के अस्थमा मामलों को रसोई गैससे जोड़ा गया है. यह रिपोर्ट ऊर्जा क्षमता समूह सीएलएएसपी और यूरोपियन पब्लिक हेल्थ अलायंस ने जारी की है. हालांकि इस रिपोर्ट की अन्य विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा नहीं की गई है. यूरोपीय रिपोर्ट में नीदरलैंड्स के शोध संगठन टीएनओ द्वारा किए गए कंप्यूटर सिम्यूलेशन्स को भी शामिल किया गया है. इन सिम्यूलेशन्स में टीएनओ ने अलग-अलग यूरोपीय देशों की रसोई में होने वाले वायु प्रदूषण की विभिन्न मात्राओं और असर का विश्लेषण किया है. इसके मुताबिक, रसोई के भीतर नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड की मात्रा हफ्ते में कई बार ईयू और डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देशों से ज्यादा पाई गई.

इनमें बड़े आकार के ऐसे रसोईघर अपवाद हैं, जिनमें चूल्हे के ऊपर लगी चिमनी (रेंज हुड) धुएं को घर के बाहर ले जाती है. गैस के जलने पर नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड उत्सर्जित होती है. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, अस्थमा समेत कई सांस की परेशानियों से इसका संबंध है. इस यूरोपीय रिपोर्ट के नतीजों की पुष्टि के लिए सीएलएएसपी इस साल यूरोप के अलग-अलग हिस्सों की 208 रसोईयों से हवा गुणवत्ता के मापदंडों की जांच करेगा.

शोधकर्ताओं ने गैस के इस्तेमाल से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर की तुलना सेकेंड-हैंड स्मोकिंग से की है.तस्वीर: Alkis Konstantinidis/REUTERS

कई विशेषज्ञों की राय अलग है

अमेरिका के संदर्भ में छपी स्टडी में शामिल एक विशेषज्ञ ने इन नतीजों पर सवाल भी उठाए हैं. उनका कहना है कि लकड़ी, चारकोल और कोयले पर खाना बनाने के मुकाबले गैस का इस्तेमाल कहीं बेहतर है. अनुमान है कि लकड़ी, चारकोल और कोयले जैसे पारंपरिक तरीकों से खाना बनाने के कारण घरों में होने वाले वायु प्रदूषण से दुनियाभर में सालाना 30 लाख से ज्यादा लोगों की मौत होती है. अधिकांश मौतें विकासशील और गरीब देशों में होती हैं.

ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल में ग्लोबल पब्लिक हेल्थ के प्रोफेसर डैनियल पोप, डब्ल्यूएचओ की एक रिसर्च टीम का हिस्सा हैं. इस रिसर्च में खाना पकाने और गरम करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अलग-अलग ईंधनों के स्वास्थ्य पर होने वाले प्रभाव की जांच की जा रही है. प्रोफेसर डैनियल ने कहा कि गैस चूल्हे से होने वाले प्रदूषण और अस्थमा के बीच के संबंध को अभी पुख्ता तौर पर साबित नहीं किया गया है. इसमें और भी शोध किए जाने की जरूरत है. उन्होंने इस ओर भी ध्यान दिलाया कि केरोसिन और जलावन जैसे ईंधन छोड़कर रसोई गैस का इस्तेमाल शुरू करने से लोगों की सेहत से जुड़ा जोखिम घटता है.

लकड़ी-कोयले से बेहतर, लेकिन क्या रसोई गैस स्वच्छ ऊर्जा है?

ब्रैडी सील्स, रॉकी माउंटेन इंस्टीट्यूट की मैनेजर और ताजा शोध की को-ऑथर हैं. वो कहती हैं कि उनकी रिसर्च में अस्थमा और गैस पर खाने पकाने के लिए बीच किसी संबंध की कल्पना नहीं की गई है. बल्कि एक्सपोजर और बीमारी के संबंध के बारे में बताया गया है. और, इसके लिए 1970 के दशक में हुए अध्ययनों समेत कई स्टडी को इस्तेमाल किया गया है. लकड़ी और कोयले जैसे ईंधनों से तुलना पर ब्रैडी सील्स कहती हैं, "लकड़ी या कोयले पर खाना पकाने की तुलना में गैस निश्चित तौर पर बेहतर है, लेकिन ये क्लीननहीं है."

उधर अमेरिका में छपी इस रिपोर्ट के बाद वहां गैस चूल्हे के इस्तेमाल पर बहस छिड़ गई है. अमेरिकन गैस असोसिएशन ने जहां इसे "गणितीय अभ्यास" कहकर खारिज किया है, वहीं कंज्यूमर प्रॉडक्ट सेफ्टी कमीशन के कमिश्नर रिचर्ड ट्रूम्का जूनियर ने कहा कि एजेंसी नियम-कायदे बनाने के आग्रहों और प्रस्तावों पर विचार करेगी.

गैस चूल्हों के असर पर पहले भी रिपोर्ट्स आ चुकी हैं. मसलन, स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता रॉब जैक्सन ने अपनी रिसर्च में बताया था कि चूल्हों के बंद होने पर भी उनसे मीथेन गैस का रिसाव हो सकता है. मीथेन, वातावरण को गरम करती हैं. ताजा रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए जैक्सन ने कहा, "दर्जनों अन्य शोधों में भी बताया जा चुका है कि गैस चूल्हे से हुए प्रदूषण के कारण घर में सांस लेने से अस्थमा हो सकता है."

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एसएम/एमजे (एएफपी)

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